अब न अजुध्या
मन में बसती
अब न बगाइच
वाला वह मन
कंकरीट के
मकड़जाल ने
फांस लिया है
सादा जीवन
कभी पकड़ना
अपनी छाया
कभी छाँह से
डर कर रहना
कभी चाँद-
तारों को चाहें
कभी धूप के
मोती चुनना
रस था
आमों के झगड़ों में
'कुट्टी' में भी
था अपनापन
छोटेपन के
बाल-इशारे
माँ समझे या समझे
बापू
जिनकी ओली ही
लगती थी
सबसे ऊंचा
सुन्दर टापू
गाँव किनारे
जखई बाबा
का वह चौपड़
था सिंहासन
धुक-धुक-धुक-धुक
जी करता है
कितने फंदे,
कितने धंधे
चढी जवानी
देखे सपना
बोझिल
झुके हुए हैं कंधे
मन ही मन
यह चाहूँ मुझमें
लौटे फिर से
मेरा बचपन
Sunday, January 19, 2014
लौटे बचपन / अवनीश सिंह चौहान
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