हज़ार ख़्वाब लिए जी रही हैं सब आँखें
तेरे बिना हैं मगर मेरी बे-सबब आँखें
चमकते चाँद सितारो गवाह तुम रहना
लगी रही हैं फ़लक से तमाम शब आँखें
तुम्हारे सामने रहती हैं नीम-वा हम-दम
हया-शनास बहुत हैं ये बा-अदब आँखें
बस एक दीद की हसरत सजा के पलकों पर
मिलेंगी तुम से ख़यालों में बे-तलब आँखें
सिला दिया है मोहब्बत का तुम ने ये कैसा
मुसर्रतों में भी रोने लगी हैं अब आँखें
Saturday, January 18, 2014
हज़ार ख़्वाब लिए जी रही हैं सब आँखें / इन्दिरा वर्मा
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