Pages

Monday, January 20, 2014

उन्मत्त-बयार / कौशल्या गुप्ता

खुसफुस मत कर!
माना, तू मेरी सहेली है।
पर, है तू उन्मत्त,
ओ पागल बयार।
गुदगुदी होती है !
जो कहना है, साफ़ कह।

और, ज़रा धीरे-धीरे,
मेरी बोली में
या, अपनी बोली सिखा।
बैठ, थिर हो
सीख तू श्रम से
बोली ही मेरी !

मुझे मालूम है बहुत सुनाना है तुझे।
सुनने का कुतूहल तो तुझमें है ही नहीं !
मैं सुन ही लूँगी।
तू करती है वैसे बस इधर-उधर की।

कौशल्या गुप्ता

0 comments :

Post a Comment