ओह क्या है यह
मेरे पहलू में
यह कैसी आग
जलती रहती है हर बखत
जिसमें मेरा हृदय
तपता रहता है
वह अग्नि है
तो राख क्यों नहीं कर जाती
मेरा हृदय
ना स्वप्न है
ना जागरण है
कैसा व्यक्तित्वांतरण है यह
कि अपनी ही शक्ल
अब बेगानी लग रही है
कि अब तो बस
वही चेहरा है
अग्निशिखा में दिपता सा
निर्धूम
जाने यह कैसी आग है
यह कौन जगता जा रहा है
मेरे अंतर में
कैसी पुकार है यह
मेरे अंतर को व्यथित करती ...
Sunday, January 5, 2014
कैसी आग है यह / अरुणा राय
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