खिड़की एकाएक खुली,
- बुझ गया दीप झोंके से,
- हो गया बन्द वह ग्रन्थ
- जिसे हम रात-रात
- बुझ गया दीप झोंके से,
- घोखते रहे,
- पर खुला क्षितिज, पौ फटी,
- प्रात निकला सूरज, जो सारे
- अन्धकार को सोख गया।
- घोखते रहे,
- धरती प्रकाश-आप्लावित!
- हम मुक्त-कंठ मुक्त-हृदय
- मुग्ध गा उठे
- बिना मौन को भंग किये।
- धरती प्रकाश-आप्लावित!
- कौन हम?
- उसी सूर्य के दूत
- अनवरत धावित।
- कौन हम?


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