रात में जागा अन्धकार की सिरकी के पीछे से
- मुझे लगा, मैं सहसा
- सुन पाया सन्नाटे की कनबतियाँ
- धीमी, रहस, सुरीली,
- मुझे लगा, मैं सहसा
परम गीतिमय।
- और गीत वह मुझ से बोला, दुर्निवार,
- अरे, तुम अभी तक नहीं जागे,
- और वह मुक्त स्रोत-सा सभी ओर बह चला उजाला!
- अरे, अभागे-कितनी बार भरा, अनदेखे,
- और गीत वह मुझ से बोला, दुर्निवार,
छलक-छलक बह गया तुम्हारा प्याला?
- मैं ने उठ कर खोल दिया वातायन-
- और दुबारा चौंका :
- वह सन्नाटा नहीं-झरोखे के बाहर
- मैं ने उठ कर खोल दिया वातायन-
ईश्वर गाता था।
- इसी बीच फिर बाढ़ उषा की आयी।


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