आ, तू आ, हाँ, आ,
- मेरे पैरों की छाप-छाप पर रखता पैर,
- मिटाता उसे, मुझे मुँह भर-भर गाली देता-
- आ, तू आ।
- मेरे पैरों की छाप-छाप पर रखता पैर,
तेरा कहना है ठीक: जिधर मैं चला
- नहीं वह पथ था:
- मेरा आग्रह भी नहीं रहा मैं चलूँ उसी पर
- सदा जिसे पथ कहा गया, जो
- नहीं वह पथ था:
इतने-इतने पैरों द्वारा रौंदा जाता रहा कि उस पर
- कोई छाप नहीं पहचानी जा सकती थी।
- मेरी खोज नहीं थी उस मिट्टी की
- जिस को जब चाहूँ मैं रौंदूँ: मेरी आँखें
- कोई छाप नहीं पहचानी जा सकती थी।
उलझी थीं उस तेजोमय प्रभा-पुंज से
- जिस से झरता कण-कण उस मिट्टी को
- कर देता था कभी स्वर्ण तो कभी शस्य,
- कभी जीव तो कभी जीव्य,
- जिस से झरता कण-कण उस मिट्टी को
अनुक्षण नव-नव अंकुर-स्फोटित, नव-रूपायित।
- मैं कभी न बन सका करुण, सदा
- करुणा के उस अजस्र सोते की ओर दौड़ता रहा जहाँ से
- सब कुछ होता जाता था प्रतिपल
- मैं कभी न बन सका करुण, सदा
आलोकित, रंजित, दीप्त, हिरण्मय
- रहस्य-वेष्टित, प्रभा-गर्भ, जीवनमय।
- मैं चला, उड़ा, भटका, रेंगा, फिसला,
- रहस्य-वेष्टित, प्रभा-गर्भ, जीवनमय।
(क्या नाम क्रिया के उस की आत्यन्तिक गति को कर सके निरूपित?)-
तू जो भी कह-आक्रोध नहीं मुझ को,
- मैं रुका नहीं मुड़ कर पीछे तकने को,
- क्यों कि अभी भी मुझे सामने दीख रहा है
- वह प्रकाश : अभी भी मरी नहीं है
- मैं रुका नहीं मुड़ कर पीछे तकने को,
ज्योति टेरती इन आँखों की।
- तू आ, तू देख कि यह पैरों की छाप पड़ी है जहाँ,
- कहीं वह है सूना फैलाव रेत का जिस में
- कोई प्यासा मर सकता है :
- तू आ, तू देख कि यह पैरों की छाप पड़ी है जहाँ,
बीहड़ झारखंड है कहीं, कँटीली
- जिस की खोहों में कोई बरसों तक चाहे भटक जाय,
- कहीं मेड़ है किसी परायी खेती की, मुड़ कर ही
- जिस के अगल-बगल से कोई गलियारा पा लेना होगा।
- जिस की खोहों में कोई बरसों तक चाहे भटक जाय,
कहीं कुछ नहीं, चिकनी काली रपटन जिस के नीचे
- एक कुलबुलाती दलदल है
- झाग-भरा मुँह बाये, घात लगाये।
- किन्तु प्यास से मरा नहीं मैं, गलियारे भी
- एक कुलबुलाती दलदल है
चाहे जैसे मुझे मिले : दलदल में भी मैं
- डूबा नहीं।
- पर आ तू, सभी कहीं, सब चिह्न रौंदता
- अपने से आगे जाने वाले के-
- डूबा नहीं।
आ, तू आ, रखता पैरों पर पैर,
- गालियाँ देता, ठोकर मार मिटाता अनगढ़
- (और अवांछित रखे गये!)
- इन मर्यादा-चिह्नों को
- गालियाँ देता, ठोकर मार मिटाता अनगढ़
आ, तू आ!
- आ तू, दर्पस्फीत जयी!
- मेरी तो तुझे पीठ ही दीखेगी-क्या करूँ कि मैं आगे हूँ
- और देखता भी आगे की ओर?
- पाँवड़े
- आ तू, दर्पस्फीत जयी!
मैंने नहीं बिछाये-वे तो तभी, वहीं
- बिछ सकते हैं प्रशस्त हो मार्ग जहाँ पर।
- आता जा तू, कहता जा जो जी आवे:
- मैं चला नहीं था पथ पर,
- बिछ सकते हैं प्रशस्त हो मार्ग जहाँ पर।
पर मैं चला इसी से
- तुझ को बीहड़ में भी ये पद-चिह्न मिले हैं,
- काँटों पर ये एकोन्मुख संकेत लहू के,
- बालू की यह लिखत, मिटाने में ही
- तुझ को बीहड़ में भी ये पद-चिह्न मिले हैं,
जिस को फिर से तू लिख देगा।
- आ तू, आ, हाँ, आ,
- मेरे, पैरों की छाप-छाप पर रखता पैर,
- जयी, युगनेता, पथ-प्रवर्त्तक,
- आ तू आ- ओ गतानुगामी!
- आ तू, आ, हाँ, आ,


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