प्यादे से वज़ीर बनते हैं ऐसी बिछी बिसात
नए भोर का भ्रम देती है निखर गई है रात
कई एक चेहरे, चेहरों के
त्रास और सन्त्रास
भीतर तक भय से भर देते
हास और परिहास
नहीं बचा `साबुत' क़द कोई ऐसा उपल निपात
बन्द गली के सन्नाटों में
कोई दस्तक जैसी
भर देती हैं खालीपन से
बातें कैसी-कैसी
नई-नई अनुगूँजें बनते नए-नए अनुपात
लोककथाएँ जिनमें पीड़ा
का अनन्त विस्तार
हम ऐसे अभ्यस्त कि
खलता कोई भी निस्तार
बातों से बातें उठती हैं सब भूले औकात ।
Monday, November 11, 2013
प्यादे से वज़ीर / अमरनाथ श्रीवास्तव
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