नामवर को बाबा
तुम्हें त्रिलोचन
और मुझे तुम
क्यों लगते हो अच्छे केदारनाथ सिंह?
शायद इसलिए कि स्वाद
एक गंध का नाम है
गंध एक स्मृति है
जो बहती है हमारी धमनियों में
जिस पर नाव की तरह तिरता है
एक प्रकाश-स्तम्भ
जो जीवंत इतिहास है।
सोचता हूँ तुम्हारी कविताएँ नहीं होतीं
तो मैं क्या पढ़ता केदार
शब्द परिचय के बावजूद?
और तुम क्या लिखते?
स्वयं तुम्हारी कविता ही
माझी का पुल है
मल्लाह के खुश होने की परछाई।
Sunday, November 17, 2013
क्यों लगते हो अच्छे केदारनाथ सिंह? / अभिज्ञात
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