नसों में छौड़ता है सौरमंडल
सृजन की छअपटाहट एक क्षण हूं
उमड़कर स्रोत से सागर बना हूं
जहां विप्लव वहां धनु-सा तना हूं
दिशाओं को लपेट समग्र तन में
कहीं उज्ज्वल कहीं शोणित सना हूं
मरण के भाल पर मैं छंद गढ़ता
ससंभ्रम सांस रोक भविष्य पढ़ता
उलझता हूं कलश जिस ठौर अपना
शिरोमणि काव्य का उस ठौर कढ़ता
सुलगता आंधियों के पर्व में मैं
सृजन की मुस्कुराहट एक क्षण हूं
हवाएं ओस-पत्तों पर खड़ी हैं
हिलोरों में मयूखें ही जड़ी हैं
सितारों में बिखर कर देखता हूं
अदेखी सृष्टियां कितनी पड़ी हैं
उफनता जलधि मैं उत्ताप बनता
उठा लेता जिसे सुरचाप बनता
सुबह से शाम तक की उम्र काफी
कहानी स्वप्न, बादल भाप बनता
कि जीवन की अनूठी कल्पना में
सृजन की जगमगाहट एक क्षण हूं।
Sunday, November 17, 2013
मरण के भाल पर मैं छंद गढ़ता / केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’
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