यहाँ तो हर घड़ी कोह-ए-निदा की ज़िद में रहते हैं
तजावुज़ के भी मौसम में हम अपनी हद में रहते हैं
बहुम मुहतात हो कर साँस लेना मोतबर हो तुम
हमारा क्या है हम तो ख़ुद ही अपनी रद में रहते हैं
सराब ओ आब की ये कशमकश भी ख़त्म ही समझो
चलो मौज-ए-सदा बर कर किसी गुम्बद में रहते हैं
सरों के बोझ को शानों पे रखना मोजज़ा भी है
हर इक पल वरना हम भी हल्क़ा-ए-सरमद में रहते हैं
Monday, October 14, 2013
यहाँ तो हर घड़ी कोह-ए-निदा की ज़िद में रहते हैं / अशअर नजमी
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