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Monday, October 14, 2013

इतने में / अच्युतानंद मिश्र

बेटी के रोने की
आवाज़ सुनाई देती है
सामने खाली दूध का
डिब्बा दिखता है
मुझे पत्नी की छाती
याद आती है
बहुत कठिन है
सोच सकना
कि सब कुछ
तय किया जा चुका
होता है
हमारे सोचने से पहले
इसलिए लिखने को
कुछ भी नहीं रह जाता है
सिवाय ’भूख’ के

अच्युतानंद मिश्र

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