Pages

Wednesday, December 24, 2014

अनमने दिन / अनिल जनविजय

दिन बीते
रीते-रीते
इन सूनी राहों पे

मिला न कोई राही
बना न कोई साथी
वन सूखे चाहों के

याद न कोई आता
न मन को कोई भाता
घेरे खाली हैं बाहों के

कलप रहा है तन
जैसे भू-अगन
दिन आए फिर कराहों के


(रचनाकाल : 2005)

अनिल जनविजय

हमारी अर्थी शाही हो नहीं सकती / अनुज लुगुन

हमारे सपनों में रहा है
एक जोड़ी बैल से हल जोतते हुए
खेतों के सम्मान को बनाए रखना
हमारे सपनों में रहा है
कोइल नदी के किनारे एक घर
जहाँ हमसे ज़्यादा हमारे सपने हों
हमारे सपनों में रही है
कारो नदी की एक छुअन
जो हमारे आलिंगनबद्ध बाजुओं को और गाढ़ा करे
हमारे सपनों में रहा है
मान्दर और नगाड़ों की ताल में उन्मत्त बियाह
हमने कभी सल्तनत की कामना नहीं की
हमने नहीं चाहा कि हमारा राज्याभिषेक हो
हमारे शाही होने की कामना में रहा है
अंजुरी भर सपनों का सच होना
दम तोड़ते वक़्त बाहों की अटूट जकड़न
और रक्तिम होंठों की अंतिम प्रगाढ़ मुहर।

हमने चाहा कि
पंडुकों की नींद गिलहरियों की धमा-चौकड़ी से टूट भी जाए
तो उनके सपने न टूटें
हमने चाहा कि
फ़सलों की नस्ल बची रहे
खेतों के आसमान के साथ
हमने चाहा कि जंगल बचा रहे
अपने कुल-गोत्र के साथ
पृथ्वी को हम पृथ्वी की तरह ही देखें
पेड़ की जगह पेड़ ही देखें
नदी की जगह नदी
समुद्र की जगह समुद्र और
पहाड़ की जगह पहाड़
हमारी चाह और उसके होने के बीच एक खाई है
उतनी ही गहरी
उतनी ही लम्बी
जितनी गहरी खाई दिल्ली और सारण्डा जंगल के बीच है
जितनी दूरी राँची और जलडेगा के बीच है
इसके बीच हैं-
खड़े होने की ज़िद में
बार-बार कूड़े के ढेर में गिरते बच्चे
अनचाहे प्रसव के ख़िलाफ़ सवाल जन्माती औरतें
खेत की बिवाइयों को
अपने चेहरे से उधेड़ते किसान
और अपने गलन के ख़िलाफ़
आग के भट्ठों में लोहा गलाते मज़दूर
इनके इरादों को आग़ से ज़्यादा गर्म बनाने के लिए
अपनी ’चाह’ के ’होने‘ के लिए
ओ मेरी प्रणरत दोस्त!
हमारी अर्थी शाही हो नहीं सकती।

हमारी मौत पर
शोकगीत के धुनें सुनाई नहीं देंगी
हमारी मौत से कहीं कोई अवकाश नहीं होगा
अख़बारी परिचर्चाओं से बाहर
हमारी अर्थी पर केवल सफ़ेद चादर होगी
धरती, आकाश
हवा, पानी और आग के रंगों से रंगी
हम केवल याद किए जाएँगे
उन लोगों के क़िस्सों में
जो हमारे साथ घायल हुए थे
जब भी उनकी आँखें ढुलकेंगी
शाही अर्थी के मायने बेमानी होगें
लोग उनके शोकगीतों पर ध्यान नहीं देंगे
वे केवल हमारे क़िस्से सुनेंगे
हमारी अंतिम-क्रिया पर रचे जाएँगे संघर्ष के गीत
गीतों में कहा जाएगा
क्यों धरती का रंग हमारे बदन-सा है
क्यों आकाश हमारी आँखों से छोटा है
क्यों हवा की गति हमारे क़दमों से धीमी है
क्यों पानी से ज़्यादा रास्ते हमने बनाए
क्यों आग की तपिश हमारी बातों से कम है

ओ मेरी युद्धरत दोस्त !
तुम कभी हारना मत
हम लड़ते हुए मारे जाएँगे
उन जंगली पगडंडियों में
उन चौराहों में
उन घाटों में
जहाँ जीवन सबसे अधिक संभव होगा।

अनुज लुगुन

राजधानी में बैल 1 / उदय प्रकाश

बादलों को सींग पर उठाए
खड़ा है आकाश की पुलक के नीचे

एक बूँद के अचानक गिरने से
देर तक सिहरती रहती है उसकी त्वचा

देखता हुआ उसे
भीगता हूँ मैं

देर तक ।

उदय प्रकाश

खेतों-खलिहानों की,फसलों की खुशबू / ओमप्रकाश यती


खेतों- खलिहानों की, फ़सलों की खुशबू
लाते हैं बाबूजी गाँवों की खुशबू

गठरी में तिलवा है ,चिवड़ा है,गुड़ है
लिपटी है अम्मा के हाथों की खुशबू

मंगरू भी चाचा हैं, बुधिया भी चाची
गाँवों में ज़िन्दा है रिश्तों की खुशबू

बाहर हैं भइया की मीठी फटकारें
घर में है भाभी की बातों की खुशबू

खिचड़ी है,बहुरा है,पिंड़िया है,छठ है
गाँवों में हरदम त्यौहारों की खुशबू

ओमप्रकाश यती

चीटियाँ-2 / अजेय

== जहाँ कुछ मीठा गिर कर छूट गया हो ==
 
घर के किसी न किसी कोने पर
(जहाँ भी कुछ मीठा गिर गया हो)
जाने कहाँ से आ कर
इकट्ठी हो जाती हैं ढेर सारी चींटियाँ
चाहे किसी भी शहर में निकल जाओ ।

तुम पंखा चलाते हो
बाल्टियाँ उंडेलते हो
हल्दियाँ बुरकते हो
झाडू मारते हो -
‘दफा हो जाओ नन्हें बदमाशो
चैन से जीने दो मुझे।’
थोड़ी ही देर में बँध जाती है फिर एक कतार।

तुम पीछा करते हो
चिप्स बिछी फर्श के किनारे-किनारे
डिस्टेम्पर पुती दीवारों के साथ-साथ
टीक के दरवाज़ों की झिर्रियों में से बाहर निकलती
मार्बल की सीढ़ियों पर, राहदरी में
गैराज के शटर के साथ-साथ
लोहे के जंगलों के पार, कोलतार की सड़कों
और धूल भरी पगडंडियों से होते हुए
जाने कहाँ तक चली गई है कतार !

निश्चय ही गांव तक ।

लाख झटकने
झाड़ने और
पोंछने के बावजूद
कैसे चिपका रह जाता है तुम्हारे संस्कारों से
शहद की बूँद सा
एक गांव ।

जाखू ,मई 2002

अजेय

खिलौना / अरुण देव

धरती पर उसके आगमन की अनुगूँज थी
व्यस्क संसार में बच्चे की आहट से
उठ बैठा कब का सोया बच्चा
और अब वहाँ एक गेंद थी
एक ऊँट थोडा सा ऊट-प-टांग
बाघ भी अपने अरूप पर मुस्कराए बिना न रह सका

पहले खिलौने की ख़ुशी में
धरती गेंद की तरह हल्की होकर लद गई
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से मिली मिट्टी की गाड़ी पर

जिसे तब से खींचे ले जा रहा है वह शिशु

अरुण देव

Tuesday, December 23, 2014

वो समय वो ज़माना रहा ही नहीं / अशोक रावत

वो समय वो ज़माना रहा ही नहीं,
सच कहा तो किसी ने सुना ही नहीं.



बात ये है हमें क्या मिला अंत में,
हम ने ये कब कहा, कुछ हुआ ही नहीं.



एक रंगीन नक्शों की फाइल तो है,
सिलसला इस के आगे बढ़ा ही नहीं.



खोट चाहत में था या कि तक़दीर में,
जिसको चाहा कभी वो मिला ही नहीं.



ढूंढ्ते ही रहे देवताओं को हम,
कोई पत्थर नज़र में चढ़ा ही नहीं.



कोई इनआम मिलता कहाँ से मुझे,
उनके दरबार में मैं गया ही नहीं.



एक शाइर सुना भूख से मर गया,
इस ख़बर को किसी ने पढ़ा ही नहीं.



कुछ पता तो चले क्यों है नाराज़ वो,
उसने मुझसे कभी कुछ कहा ही नहीं.

अशोक रावत

घर नियराया / ओम प्रभाकर

जैसे-जैसे घर नियराया।

बाहर बापू बैठे दीखे

लिए उम्र की बोझिल घड़ियाँ।

भीतर अम्माँ रोटी करतीं

लेकिन जलती नहीं लकड़ियाँ।


कैसा है यह दृश्य कटखना

मैं तन से मन तक घबराया।


दिखा तुम्हारा चेहरा ऐसे

जैसे छाया कमल-कोष की।

आँगन की देहरी पर बैठी

लिए बुनाई थालपोश की।


मेरी आँखें जुड़ी रह गईं

बोलों में सावन लहराया।
ओम प्रभाकर