Sunday, February 23, 2014
Saturday, February 22, 2014
हँस के फ़रमाते हैं वो देख कर हालत मेरी / अमीर मीनाई
हँस के फ़रमाते हैं वो देख कर हालत मेरी
क्यों तुम आसान समझते थे मुहब्बत मेरी
बाद मरने के भी छोड़ी न रफ़ाक़त मेरी
मेरी तुर्बत से लगी बैठी है हसरत मेरी
मैंने आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी खेंचा तो कहा
पिस गई पिस गई बेदर्द नज़ाकत मेरी
आईना सुबह-ए-शब-ए-वस्ल जो देखा तो कहा
देख ज़ालिम ये थी शाम को सूरत मेरी
यार पहलू में है तन्हाई है कह दो निकले
आज क्यों दिल में छुपी बैठी है हसरत मेरी
हुस्न और इश्क़ हमआग़ोश नज़र आ जाते
तेरी तस्वीर में खिंच जाती जो हैरत मेरी
किस ढिटाई से वो दिल छीन के कहते हैं 'अमीर'
वो मेरा घर है रहे जिस में मुहब्बत मेरी
ऊसर जमीन भी बन सकती है फिर से उपजाऊ 3 / उमेश चौहान
एक हरा-भरा उपजाऊ खेत
आज ऊसर में तब्दील हो गया है,
जरूर सींचा होगा इसे साल दर साल
किसी गरीब मजदूर ने
खाली पेट अपने पसीने से
और इत्र से नहाया होगा रोज़ इसका निठल्ला जमींदार,
जरूर रेशमी चादर बिछाकर सोई होगी बरसों घर की मालकिन
रोज़ शाम उस मजदूर की बीबी से
अपने बेकारी से थके नितंबों को दबवाती हुई,
जरूर लगी होगी इस खेत को उनकी हाय
जो बरसों से इसे जोतते, बोते, सींचते, गोड़ते और काटते हुए भी
अपने किसान होने का दावा भी नहीं कर सकते
गल्ले के किसी सरकारी खरीद-केन्द्र पर।
अब और कोई चारा नहीं
अगर बनाना है इस ऊसर खेत को फिर से उपजाऊ
तो सौंप देना होगा इसे छीनकर उन निकम्मे लोगों से
सर्जना को आतुर मेहकतकश हाथों में
वे जरूर बना देंगे इसे फिर से उपजाऊ
भले ही उन्हें सींचना पड़े इसे अपने खून से भी।
हे अग्नि! / ऋषभ देव शर्मा
हे अग्नि!
तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।
बहुत क्षमता है तुममें
बड़ा ताप है -
बड़ी जीवंतता।
तुम जल में भी सुलगती हो
और वायु में भी,
भूगर्भ में भी तुम्हीं विराजमान हो
और व्यापती हो आकाश में भी तुम।
हमारे अस्तित्व में अवस्थित हो तुम
प्राण बनकर।
परमपावनी!
तुममें अनंत संभावनाएँ हैं
तुम्हीं से पवित्रता है इस जगत में।
फूँकती हो तुम सारे कलुष को,
शोधती हो फिर-फिर
हिरण्यगर्भ ज्ञान की शिखा को।
तुम ही तो जगती हो
हमारे अग्निहोत्र में
और आवाहन करते हैं तुम्हारा ही तो
संध्या के दीप की लौ में हम।
जगो, आज फिर,
खांडवप्रस्थ फैला है दूर-दूर
डँसता है प्रकाश की किरणों को,
फैलाता है अँधेरे का जाल
उगलता है भ्रम की छायाओं को।
उठो, तुम्हें करना है
छायाओं में छिपे सत्य का शोध।
तुम चिर शोधक हो, हे अग्नि!
तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।
बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये / फ़राज़
बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये
के अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये
करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला
यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये
मगर किसी ने हमे हमसफ़र नही जाना
ये और बात के हम साथ साथ सब के गये
अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिये
ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये
गिरफ़्ता दिल थे मगर हौसला नही हारा
गिरफ़्ता दिल हैं मगर हौसले भी अब के गये
तुम अपनी शम्ऐ-तमन्ना को रो रहे हो "फ़राज़"
इन आँधियों मे तो प्यारे चिराग सब के गये
सुनो / अनुज लुगुन
माँ के वक्ष-सा
भू पर बिखरे पर्वत
आसमान को थाह लेने की आकांक्षा में
ज़मीन पर खड़े वृक्ष
धूप में सूखती नदी के गीले केश
पान कराते हैं जो दैनिक
चिड़ियों और जानवरों के आहट से संगीत
मूक खड़े कह रहे हैं
कातर दृष्टि से-
मत ललकारों हमें
मूक हैं किन्तु
अपना अधिकार मालूम है
जो भी प्रतिक्रिया होगी
वह प्रतिशोध नहीं
हक़ की लड़ाई होगी
क्यों तोड़ रहे हो
हमारे घरौन्दों को
हमें क्यों सिमटा कर रख देना चाहते हो
क्या ये जग केवल तुम्हारा है?
न तेरा न मेरा
हम दोनों का यह संसार
कुछ कहता हमसे मूक संसार।
संवेदन शून्य हम नहीं
हममें भी पीड़ा है
यह तुम्हारी विवेकता का प्रमाण नहीं
शान्त, निर्दोष को छेड़ते हो
हमें भी उन्मुक्त उड़ान की चाह है
जितना पर काटोगे
हम उतना ही फड़केंगे ।
सुधार लो अपना चाल-चलन व्यवहार
हमारे साथ खुद भी मिट जाओगे
न हो जंग आर-पार
कुछ कहता हमसे मूक संसार ।
परीक्षा उचित है किन्तु
अपनी सीमा में
हमारे धैर्य का बाँध जब टूटेगा
टूटेगा मानव तुमपर
टपदाओं का पहाड़
हाथ ऊपर उठेंगें
आँखें बन्द होंगी
किन्तु इस दिखावे से कुछ न होगा
पूजना हो तो
अपने अस्तित्व को पूजो
जो हमसे जुड़ा है।
बाँट लें आपस में प्यार
दोनों का यह अधिकार
कुछ कहता हमसे मूक संसार ।
हमें ख़बर नहीं कुछ कौन है कहाँ कोई है / अबरार अहमद
हमें ख़बर नहीं कुछ कौन है कहाँ कोई है
हमेशा शाद हो आबाद हो जहाँ कोई है
जगह न छोड़े कि सैल-ए-बला है तेज़ बहुत
उड़ा पड़ा ही रहे अब जहाँ तहाँ कोई है
फ़िशार-ए-गिर्या किसी तौर बे-मक़ाम नहीं
दयार-ए-ग़म है कहीं पर पस-ए-फ़ुगाँ कोई है
वो कोई ख़दशा है या वहम ख़्वाब है कि ख़याल
कि हो न हो मिरे दिल अपने दरमियाँ कोई है
कभी तो ऐसा है जैसे कहीं पे कुछ भी नहीं
कभी ये लगता है जैसे यहाँ वहाँ कोई है
कभी कभी तो ये लगता है फ़र्द फ़र्द हैं हम
ये और बात हमारा भी कारवाँ कोई है
कहीं पहुँचना नहीं है उसे मगर फिर भी
मिसाल-ए-बाद-ए-बहाराँ रवाँ-दवाँ कोई है
हुआ है अपने सफ़र से हज़र से बेगाना
वहीं वहीं पे नहीं है जहाँ जहाँ कोई है
छलक जो उठती है ये आँख फ़र्त-ए-वस्ल में भी
तो सरख़ुशी में अभी रंज-ए-राएगाँ कोई है
शिकस्त-ए-दिल है तो क्या राह-ए-इश्क़ तर्क न कर
ये देख क्या कहीं परवर्दा-ए-ज़ियाँ कोई है
अब उस निगाह-ए-फ़ुसूँ-कार का क़ुसूर है क्या
हमें दिखाओ अगर ज़ख्म का निशाँ कोई है
कहीं पे आज भी वो घर है हँसता बस्ता हुआ
ये वहम सा है तिरे दिल को या गुमाँ कोई है
जवार क़र्या-ए-याराँ में जा निकलता हूँ
कि जैसे अब भी वहीं मेरा मेहरबाँ कोई है
मेरे लिये / अवनीश सिंह चौहान
कहो जी कहो तुम
कहो कुछ अब तो कहो
मेरे लिये!
भट्ठी-सी जलती हैं
अब स्मृतियाँ सारी
याद बहुत आती हैं
बतियाँ तुम्हारी
रहो जी रहो तुम
रहो साँसो में रहो
मेरे लिये!
बेचेनी हो मन में
हो जाने देना
हूक उठे कोई तो
तडपाने देना
सहो जी सहो तुम
सहो धरती-सा सहो
मेरे लिये!
चारों ओर समंदर
यह पंछी भटके
उठती लहरों का डर
तन-मन में खटके
मिलो जी मिलो तुम
मिलो कश्ती-सा मिलो
मेरे लिये!

