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Friday, November 29, 2013

पुलिस-महिमा / काका हाथरसी

पड़ा - पड़ा क्या कर रहा , रे मूरख नादान
दर्पण रख कर सामने , निज स्वरूप पहचान
निज स्वरूप पह्चान , नुमाइश मेले वाले
झुक - झुक करें सलाम , खोमचे - ठेले वाले
कहँ ‘ काका ' कवि , सब्ज़ी - मेवा और इमरती
चरना चाहे मुफ़्त , पुलिस में हो जा भरती

कोतवाल बन जाये तो , हो जाये कल्यान
मानव की तो क्या चले , डर जाये भगवान
डर जाये भगवान , बनाओ मूँछे ऐसीं
इँठी हुईं , जनरल अयूब रखते हैं जैसीं
कहँ ‘ काका ', जिस समय करोगे धारण वर्दी
ख़ुद आ जाये ऐंठ - अकड़ - सख़्ती - बेदर्दी

शान - मान - व्यक्तित्व का करना चाहो विकास
गाली देने का करो , नित नियमित अभ्यास
नित नियमित अभ्यास , कंठ को कड़क बनाओ
बेगुनाह को चोर , चोर को शाह बताओ
‘ काका ', सीखो रंग - ढंग पीने - खाने के
‘ रिश्वत लेना पाप ' लिखा बाहर थाने के

काका हाथरसी

कचरा बीननेवाला लड़का / कुमार सुरेश

कोई ऋतु मौजूद नहीं होती
अपने ख़ालिस रूप में
उस लड़के के पास
जो बीनता है कचरा
अपने छोटे हाथों से

सचमुच कोई ऋतु नहीं
न सुहानी बारिश
न हाड़ कँपाती ठंड
न आग बरसाती लू

बारिश का एक ही मतलब होता है
कीमती कचरे का पानी से
ख़राब हो जाना

गर्मी का भी एक मतलब
बहुत से कचरे का हो जाना
आग के हवाले

सर्दी का मतलब इकट्ठा किए
कचरे को ख़ुद करना
आग के हवाले

उसके सपने में भी कोई
मौसम नहीं आता

बारिश का पानी,
काग़ज़ की कश्ती भी नहीं
रंगीन स्वेटर, गर्म बोर्नविटा नहीं
कोई पहाड़ या झरना नहीं
कार्टून फिल्म या हैरी पॉटर भी नहीं

आता है अक्सर एक कचरे का पहाड़ ही
जिस पर वह
इस तरह ओंधा लेटा रहता है
कि कचरे और लड़के के बीच
फ़र्क़ करना मुश्किल होता है।

कुमार सुरेश

उससे कहना कि कमाई के न चक्कर में रहे / 'अना' क़ासमी

उससे कहना कि कमाई के न चक्कर में रहे
दौर अच्छा नहीं बेहतर है कि वो घर में रहे

जब तराशे गए तब उनकी हक़ीक़त उभरी
वरना कुछ रूप तो सदियों किसी पत्थर में रहे

दूरियाँ ऐसी कि दुनिया ने न देखीं न सुनीं
वो भी उससे जो मिरे घर के बराबर में रहे

वो ग़ज़ल है तो उसे छूने की ह़ाजत भी नहीं
इतना काफ़ी है मिरे शेर के पैकर में रहे

तेरे लिक्खे हुए ख़त भेज रहा हूँ तुझको
यूँ ही बेकार में क्यों दर्द तिरे सर में रहे

ज़िन्दगी इतना अगर दे तो ये काफ़ी है ’अना’
सर से चादर न हटे पाँव भी चादर में रहे

'अना' क़ासमी

विदेशिनी-2 / कुमार अनुपम

वहाँ
तुम्हारा माथा तप रहा है
बुखार में

मैं बस आँसू में
भीगी कुछ पंक्तियाँ भेजता हूँ यहाँ से
इन्हें माथे पर धरना... ।

कुमार अनुपम

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना / फ़राज़

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना
मुझे गुमाँ भी ना हो और तुम बदल जाना

ये शोलगी हो बदन की तो क्या किया जाये
सो लाजमी है तेरे पैरहन का जल जाना

तुम्हीं करो कोई दरमाँ, ये वक्त आ पहुँचा
कि अब तो चारागरों का भी हाथ मल जाना

अभी अभी जो जुदाई की शाम आई थी
हमें अजीब लगा ज़िन्दगी का ढल जाना

सजी सजाई हुई मौत ज़िन्दगी तो नहीं
मुअर्रिखों ने मकाबिर को भी महल जाना

ये क्या कि तू भी इसी साअते-जवाल में है
कि जिस तरह है सभी सूरजों को ढल जाना

हर इक इश्क के बाद और उसके इश्क के बाद
फ़राज़ इतना आसाँ भी ना था संभल जाना

शोलगी - अग्नि ज्वाला, मुअर्रिख - इतिहास कार
मकाबिर - कब्र का बहुवचन, साअते-जवाल - ढलान का क्षण

अहमद फ़राज़

क्या खोएंगे आज न जाने / ओमप्रकाश यती


क्या खोएँगे आज न जाने
हम निकले हैं फिर कुछ पाने

ज़ाहिर खूब करें याराने
भीतर साधें लोग निशाने
 
कैसे - कैसे काम बनेगा
बुनते रहते ताने - बाने

अब भी यूँ लगता है जैसे
अम्मा बैठी है सिरहाने

घर ने मुझको ऐसे घेरा
छूटे सारे मीत पुराने

बेपरवाही भूल गए हम
रहते हैं हरदम कुछ ठाने


अम्मा तो जी भर के रोई
पीर सही चुपचाप पिता ने

ओमप्रकाश यती

इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद/ अल्ताफ़ हुसैन हाली


इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद
ख़ुद-ब-ख़ुद[1], दिल में है इक शख़्स समाया जाता

शब को ज़ाहिद से न मुठभेड़ हुई ख़ूब हुआ
नश्अ ज़ोरों पे था शायद न छुपाया जाता

लोग क्यों शेख़ को कहते हैं कि अय्यार है वो
उसकी सूरत से तो ऐसा नहीं पाया जाता


अब तो तफ़क़ीर[2], से वाइज़[3],  ! नहीं हटता ‘हाली’
कहते पहले तो दे-ले के हटाया जाता

अल्ताफ़ हुसैन हाली

शोर / अजेय

मैंने कभी शोर नहीं चाहा।
हमेशा चुप रहा मैं
फिर भी लगातार चीखा है
एक जानवर
मेरे भीतर
और न सुन पाया तुम्हारी कोई पुकार ।

1992

अजेय