बाँची तो थी मैंने खण्डहरों में लिखी हुई इबारत
लेकिन मुमकिन कहाँ था उतना उस वक्त ज्यो का त्यो याद रख पाना
और अब लगता है कि बच नहीं सकता मेरा भी इतिहास बन जाना
कि बाँचा तो जाउँगा लेकिन जी न पाउंगा
Monday, December 8, 2014
बांची तो थी मैंने / कन्हैयालाल नंदन
Thursday, November 20, 2014
मध्मवर्गीय पत्नी से / कुँअर बेचैन
कल समय की व्यस्तताओं से निकालूँगा समय कुछ
फिर भरुँगा खुद तुम्हारी माँग में सिन्दूर
मुझको माफ़ करना
आज तो इस वक्त काफी देर ऑफिस को हुई है
हाँ जरा सुनना वो मेरी पेंट है न
वो फटी है जो अकेले पाँयचों पर
तुम जरा उसमें लगाकर चन्द टाँके
शर्ट के टूटे बटन भी टाँक देना
इस तरह से, जो नई हर कोई आँके
कल थमे वातावरण से, मैं निकालूँगा प्रलय कुछ
ले चलूँगा फिर तुम्हें इस भीड़ से भी दूर
मुझको माफ करना
आज तो इस वक्त काफी देर, ग्यारह पर सुई है
क्या कहा, है आज पप्पू का जन्मदिन
तुम सुनो, ये बात पप्पू से न कहना
और दिन भर तुम उसी के पास रहना
यदि करे तुमको परेशां, मारना मत
और हाँ, तुम भी कहीं मन हारना मत
कल पराजय के जलधि से, मैं निकालूँगा विजय कुछ
फिर मनायेंगे जन्मदिन की खुशी भरपूर
मुझको माफ करना
आज तो ये जेब भी मेरी फटेपन ने छुई है
-- यह रचना Dr.Bhawna Kunwar द्वारा कविता कोश में डाली गयी है।
Tuesday, November 11, 2014
गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं / फ़राज़
गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं
उदास तुम भी हो यारों उदास हम भी हैं
फक्त तुमको ही नहीं रंज-ए-चाक दमानी
जो सच कहें तो दरीदा लिबास हम भी हैं
तुम्हारे बाम की शम्में भी तब्नक नहीं
मेरे फलक के सितारे भी ज़र्द ज़र्द से हैं
तुम्हें तुम्हारे आइना खाने की ज़न्गालूदा
मेरे सुराही और सागर गर्द गर्द से हैं
न तुमको अपने खादों खाल ही नज़र आयें
न मैं यह देख सकूं जाम में भरा क्या है
बशारतों पे वोह जले पड़े की दोनों को
समझ में कुछ नहीं आता की माज़रा क्या है
न सर में व्हो गरूर-ए-कसीदा कामती है
न कुम्रियों की उदासी में कुछ कमी आई
न खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के गुलाब
न शाख-ए-अमन लिए फाख्ता कोई आई
आलम तो यह है की दोनों के मर्ज़ारों से
हवा-ए-फितना-ओ-बू-ए-फसाद आती है
सितम तो यह है की दोनों को वहम है की बहार
उदूक-ए-खून में नहाने के बाद आती है
सो यह माल हुआ की इस दरिंदगी का की
अब तुम्हरे हाथ सलामत रहे न हाथ मेरे
करें तो किस से करें अपनी लग्ज़िसों का गिला
न कोई साथ तुम्हरे न कोई साथ मेरे
तुम्हें भी जिद है की मास्क-ए-सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ की जारो जाफा के आदि हैं
तुम्हें भी जोम महाभारत लड़ी तुमने
हमें भी फख्र की हम कर्बला के आदि हैं
तुम्हरे हमारे शहरों की मजबूर बनवा मखलूक
दबी हुई हैं दुखों के हजार्ड हेरों में
अब इनकी तीर-ए-नाशी भी चिराग चाहती है
जो लोग उन्नीस सदी तक रहे अंधेरों में
चिराग जिन से मोहब्बत को रौशनी फैले
चिराग जिन से दिए बेशुमार रोशन हों
तुम्हारे देश में आया हूँ दोस्तों
अब के न साज़-ओ-नगमों की महफ़िल न शायरी के लिए
अगर तुम्हरी ही आन का है सवाल
तो चलो मैं हाथ बढ़ता हूँ दोस्ती के लिए
Tuesday, October 28, 2014
नदी की कहानी / कन्हैयालाल नंदन
नदी की कहानी कभी फिर सुनाना,
मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना।
मुझे वो मिलेगा ये मुझ को यकीं है
बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना
मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था
भँवर देखना कूदना डूब जाना।
अभी मुझ से फिर आप से फिर किसी
मियाँ ये मुहब्बत है या कारखाना।
ये तन्हाईयाँ, याद भी, चान्दनी भी,
गज़ब का वज़न है सम्भलके उठाना।
Monday, March 31, 2014
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से / कुँअर बेचैन
जितनी दूर नयन से सपना
जितनी दूर अधर से हँसना
बिछुए जितनी दूर कुँआरे पाँव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से
हर पुरवा का झोंका तेरा घुँघरू
हर बादल की रिमझिम तेरी भावना
हर सावन की बूंद तुम्हारी ही व्यथा
हर कोयल की कूक तुम्हारी कल्पना
जितनी दूर ख़ुशी हर ग़म से
जितनी दूर साज सरगम से
जितनी दूर पात पतझर का छाँव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से
हर पत्ती में तेरा हरियाला बदन
हर कलिका के मन में तेरी लालिमा
हर डाली में तेरे तन की झाइयाँ
हर मंदिर में तेरी ही आराधना
जितनी दूर प्यास पनघट से
जितनी दूर रूप घूंघट से
गागर जितनी दूर लाज की बाँह से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से
कैसे हो तुम, क्या हो, कैसे मैं कहूँ
तुमसे दूर अपरिचित फिर भी प्रीत है
है इतना मालूम की तुम हर वस्तु में
रहते जैसे मानस् में संगीत है
जितनी दूर लहर हर तट से
जितनी दूर शोख़ियाँ लट से
जितनी दूर किनारा टूटी नाव से
उतनी दूर पिया तू मेरे गाँव से
Saturday, February 8, 2014
ज़िन्दगी यूँ ही चली / कुँअर बेचैन
ज़िन्दगी यूँ ही चली यूँ ही चली मीलो तक
चन्दनी चार कदम, धूप चली मीलों तक
प्यार का दाँव अजब दाँव है जिसमे अक्सर
कत्ल होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक
घर से निकला तो चली साथ मे बिटिया भी हँसी
खुशबू इन से ही जी रही नन्ही कली
मन के आँचल मे जो सिमटी तो घुमड़ कर बरसी
मेरी पलको पे जो एक पीर पली मीलों तक

