सारे आलम में किया तुझ को तलाश।
तू ही बतला है रगेगरदन कहाँ ?
खूब था सहरा, पर ऐ ज़ौके़-जुनूँ।
फाड़ने को नित नये दामन कहाँ ?
वो लज़्ज़ते-सितम का जो ख़ूगर समझ गये।
अब ज़ुल्म मुझपै है कि सितम गाह-गाह का॥
शीशे में मौजे-मय को यह क्या देखते हैं आप।
इसमें जवाब है उसी बर्के़- निगाह का॥
मेरी वहशत पै बहस-आराइयाँ अच्छी नहीं नासेह!
बहुत-से बाँध रक्खे हैं गरेबाँ मैंने दामन में॥
इलाही कौन समझे मेरी आशुफ़्ता मिज़ाजी को।
क़फ़स में चैन आता है, न राहत है नशेमन में॥
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Thursday, October 2, 2014
चंद रुबाइयात / असग़र गोण्डवी
Wednesday, March 19, 2014
एक रुबाई / आसी ग़ाज़ीपुरी
दागे़दिल दिलबर नहीं, सिने से फिर लिपटा हूँ क्यों?
मैं दिलेदुश्मन नहीं, फिर यूँ जला जाता हूँ क्यों?
रात इतना कहके फिर आशिक़ तेरा ग़श कर गया।
"जब वही आते नहीं , मैं होश में आता हूँ क्यों?
आसी ग़ाज़ीपुरी
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Monday, October 14, 2013
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