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Saturday, December 6, 2014

मिस्टर के की दुनिया: पेड़ और बम-६ / गिरिराज किराडू

प्रेम में हम सब गलत ट्रेन पकड़ते हैं
हमारी घड़ियाँ समय हमेशा गलत बताती हैं
तुम जिससे दस बरस पहले प्रेम करते थे
उसे अब प्रेम है तुमसे
अब जबकि किसी और की घड़ी में प्रेम समय बजा है

गिरीराज किराडू

Friday, November 14, 2014

मिस्टर के की दुनिया: पेड़ और बम-१ / गिरिराज किराडू

अब मैं एक कवि की तरह नहीं रहता
मुझे खंज़र की उदासीनता से डर लगने लगा है
अब मैं एक नागरिक की तरह नहीं रहता
मुझे एक वधिक की करुणा से डर लगने लगा है
अब मैं एक प्रेमी की तरह नहीं रहता
मुझे अपनी भाषा के अभिनय से डर लगने लगा है

उन्हें मेरी कब्र पर बवाल पर मत करने देना
मुझे मृतक होने से डर लगने लगा है

गिरीराज किराडू

Thursday, November 13, 2014

मिस्टर के की दुनिया: पेड़ और बम-५ / गिरिराज किराडू

उसे रोज याद दिलाने पड़ते हैं
कवि के कर्तव्य
कवि भाषा में नहीं
उसकी शर्म में रहता है

गिरीराज किराडू

Tuesday, October 21, 2014

मिस्टर के की दुनिया: पेड़ और बम-४ / गिरिराज किराडू

अलंकारहीन भाषा में
जिसमें कोई कपट न हो
कोई रूपक न हो
क्षमा मांगनी है तुमसे

क्षमा करो कि प्रेम करता हूँ तुमसे
यूं खो तो तुम्हें तभी दिया था जब कहा था प्रेम करता हूँ तुमसे

गिरीराज किराडू

Saturday, November 30, 2013

मिस्टर के की दुनिया: पेड़ और बम-७ / गिरिराज किराडू

घड़ियों से प्रेम मत करो
ट्रेनों से उससे भी कम
और भाषा से सबसे कम
जिस भाषा में तुम रोते हो वही किसी का अपमान करने की सबसे विकसित तकनीक है

तुम भाषा की शर्म में रहते हो
और वे चीख रहे हैं गर्व में
तुम्हारे पास अगर कुछ है तो अपने को बम में बदल देने का विकल्प
और तुम अभी भी सोचते हो बम धड़कता नहीं है
तुम अपने सौ एक सौ अस्सी के रक्तचाप को सम्भाल के रक्खो

एक हिंसक मौत की कामना हर अहिंसक की मजबूरी है
इसीलिये मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है

घड़ी देखो और अपने रक्तचाप में डूब मरो

गिरीराज किराडू