कितना प्रामाणिक था उसका दुख
लड़की को कहते वक़्त जिसे मानो
उसने अपनी अंतिम पूंजी भी दे दी
लड़की अभी सयानी थी
इतनी भोली सरल कि उसे सुख का
आभास तो होता था
पर नहीं जानती थी दुख बाँचना
पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश में
कुछ तुकों और लयबद्ध पंक्तियों की
माँ ने कहा पानी में झाँककर
अपने चेहरे पर मत रीझना
आग रोटियाँ सेंकने के लिए होती है
जलने के लिए नहीं
वस्त्राभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह
बंधन हैं जीवन के
माँ ने कहा लड़की होना
पर लड़की जैसा दिखाई मत देना।
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Wednesday, November 26, 2014
माँ का दुख / ऋतुराज
Saturday, March 15, 2014
माँ से बातें / आभा बोधिसत्त्व
माँ!
चांद देखकर ख़ुश होते हैं बच्चे
पर मुझे यह चांद न सुहाया
क्यों नहीं हुई ख़ुशी इसे देखकर
कभी भी
न आंगन के ताल में
न नदियों के जल में
न नम आँखों में
कहीं भी इसे देखकर ख़ुशी नहीं हुई।
ऎसा क्यों हुआ, माँ !
तुम बता सकती हो मुझे
क्योंकि मैंने सुना है
माँएँ समझती हैं
अपने बच्चों के मन को ठीक से।
क्यों न हो, माँ!
मुझे आन लो हमेशा के लिए
अपने पास
और तुम मुझे सुलाकर इस चांद को
हटा दो मेरे मन से
मैं भूल जाऊँ कि चांद होता ही नहीं ।
क्या ऎसा हो सकता है, माँ!
आभा बोधिसत्त्व
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