परीशाँ हो गया दिल, ज़हन में अंजाम आते ही ।
चले जाएँगे चारागर, मुझे आराम आते ही ।
बड़े पुरअम्न लहजे में मुख़ातिब थी दिए की लौ,
भड़क उट्ठी मेरे लब पर हवा का नाम आते ही ।
पुकारा चीख़ कर फ़ौरन उसे वक्ती ज़रूरत ने,
हमारी बेनियाज़ी की तरफ़ दो गाम आते ही ।
अगर ये फूल बदनामी के मुरझा भी गए तो क्या,
नए गुल फिर खिला देगा कोई गुलफ़ाम आते ही ।
नया पौदा उगाने में अगर मिट भी गए तो क्या,
उसी के बीज थे जब हम तो उसके काम आते ही ।
अदब-अख्लाक़ के सब तोड़ डाले उसने पैमाने,
हमारी प्यास की जानिब दुबारा जाम आते ही ।
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Sunday, November 10, 2013
परीशाँ हो गया दिल,ज़हन में अंजाम आते ही / ओम प्रकाश नदीम
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