पयाम[1] आये हैं उस यार-ए-बेवफ़ा[2]के मुझे
जिसे क़रार[3] न आया कहीं भुला के मुझे
जुदाइयाँ हों तो ऐसी कि उम्र भर न मिले
फ़रेब[4]तो दो ज़रा सिलसिले बढ़ा के मुझे
नशे से कम तो नहीं याद-ए-यार [5] का आलम[6]
कि ले उड़ा है कोई दोश[7] पर हवा के मुझे
मैं ख़ुद को भूल चुका था मगर जहाँ वाले
उदास छोड़ गये आईना[8] दिखा के मुझे
तुम्हारे बाम[9]से अब कम नहीं है रिफ़अते-दार[10]
जो देखना हो तो देखो नज़र उठा के मुझे
खिँची हुई है मेरे आँसुओं में इक तस्वीर
'फराज़' देख रहा है वो मुस्कुरा के मुझे
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Tuesday, January 28, 2014
पयाम आये हैं उस यार-ए-बेवफ़ा के मुझे / फ़राज़
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