चोट लगी तो अपने अन्दर चुपके चुपके रो लेते हो
अच्छी बात है आसानी से जख्मों को तुम धो लेते हो
दिन भर कोशिश करते हो सबको गम का दरमाँ मिल जाये
नींद की गोली खाकर शब भर बेफ़िक्री में सो लेते हो
अपनों से मोहतात रहो, सब नाहक़ मुश्रिक समझेंगे
ज्यों ही अच्छी मूरत देखी पीछे पीछे हो लेते हो
ख़ुशएख्लाक़ी ठीक है लेकिन सेहत पे ध्यान ज़रूरी है
बैठे बैठे सब के दुख में अपनी जान भिगो लेते हो
क्यों ठोकर खाते फिरते हो अनदेखे से रस्तों पर
जख्मों के भरने से पहले पत्थर और चुभो लेते हो
'अंसारी जी' आस न रक्खो कोई तुम्हें पढ़ पायेगा
क्या यह कम है पलकों में तुम हर्फ़-ए-अश्क पिरो लेते हो
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Friday, January 31, 2014
तुम्हारे ग़म का मौसम है अभी तक / अनीस अंसारी
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