चलता है, तो चल आँधी-सा ; बढता जा आगे तू!
जलना है, तो जल फूसों-सा ; जीवन में करता धू-धू!
क्षणभर ही आँधी रहती है ; आग फूस की भी क्षणभर!
किन्तु उसी क्षण में हो जाता जीवन-मय भू से अम्बर!
मलयानिल-सा मंद-मंद मृदु चलना भी क्या चलना है?
ओदी लकड़ी-सा तिल-तिल कर जलना भी क्या जलना है?
Showing posts with label जीवन / आरसी प्रसाद सिंह. Show all posts
Showing posts with label जीवन / आरसी प्रसाद सिंह. Show all posts
Wednesday, October 30, 2013
जीवन / आरसी प्रसाद सिंह
Subscribe to:
Posts
(
Atom
)

