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Sunday, November 23, 2014

जब अश्कों में सदाएँ ढल रही थीं / अम्बरीन सलाहुद्दीन

जब अश्कों में सदाएँ ढल रही थीं
सर-ए-मिज़्गाँ दुआएँ जल रही थीं

लहू में ज़हर घुलता जा रहा था
मेरे अंदर बालाएँ पल रही थीं

मुक़य्यद हब्स में इक मस्लहत के
उम्मीदों की रिदाएँ गल रही थीं

परों में यासियत जमने लगी थी
बहुत मुद्दत हवाएँ शल रही थीं

वहाँ उस आँख ने तेवर जो बदले
यहाँ सारी दिशाएँ जल रही थीं

अम्बरीन सलाहुद्दीन