घर-मकान में
क्या बदला है
गौरैया रूठ गई
भाँप रहे
बदले मौसम को
चिड़िया और चिरौटे
झाँक रहे
रोशनदानों से
कभी गेट पर बैठे
सोच रहे
अपने सपनों की
पैंजनिया टूट गई
शायद पेट से
भारी चिड़िया
नीड़ बुने, पर कैसे
ओट नहीं
कोई छोड़ी है
घर पत्थर के ऐसे
चुआ डाल से होगा
अंडा
किस्मत ही फूट गई
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Sunday, December 7, 2014
चिड़िया और चिरौटे / अवनीश सिंह चौहान
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