ग़मों के नूर में लफ़्जों को ढालने निकले
गुहरशनास समंदर खंगालने निकले
खुली फ़िज़ाओं के आदी हैं ख़्वाब के पंछी
इन्हें क़फ़स में कहाँ आप पालने निकले
सफ़र है दूर का और बेचराग़ दीवाने
तेरे ही ज़िक्र से रातें उजालने निकले
शराबखानो कभी महफ़िलों की जानिब हम
ख़ुद अपने आप से टकराव टालने निकले
सियाह शब ने नई साज़िशें रची शायद
हवा के हाथ कहाँ ख़ाक डालने निकले
Showing posts with label ग़मों के नूर में लफ़्जों को ढालने निकले / अखिलेश तिवारी. Show all posts
Showing posts with label ग़मों के नूर में लफ़्जों को ढालने निकले / अखिलेश तिवारी. Show all posts
Friday, November 14, 2014
ग़मों के नूर में लफ़्जों को ढालने निकले / अखिलेश तिवारी
Subscribe to:
Posts
(
Atom
)

