खैंची लबों ने आह कि सीने पे आया हाथ ।
बस पर सवार दूर से उसने हिलाया हाथ ।
महफ़िल में यूँ भी बारहा उसने मिलाया हाथ ।
लहजा था ना-शनास[1] मगर मुस्कुराया हाथ ।
फूलों में उसकी साँस की आहट सुनाई दी,
बादे सबा[2] ने चुपके से आकर दबाया हाथ ।
यँू ज़िन्दगी से मेरे मरासिम[3] हैं आज कल,
हाथों में जैसे थाम ले कोई पराया हाथ ।
मैं था ख़मोश जब तो ज़बाँ सबके पास थी,
अब सब हैं लाजवाब तो मैंने उठाया हाथ ।
Showing posts with label खैंची लबों ने आह कि सीने पे आया हाथ / 'अना' क़ासमी. Show all posts
Showing posts with label खैंची लबों ने आह कि सीने पे आया हाथ / 'अना' क़ासमी. Show all posts
Wednesday, October 9, 2013
खैंची लबों ने आह कि सीने पे आया हाथ / 'अना' क़ासमी
Subscribe to:
Posts
(
Atom
)

