समय दिन-पर-दिन बदतर होता जा रहा है, सभी
कहते हैं सिवाय अख़बारों के जिनके लिए
लोकतन्त्र की स्थिरता विश्वास ही नहीं, अर्जन
का भी साधन है, अगला क़दम किस ओर रखें
यह किसी के लिए भी साफ़ नहीं सिवाय ठेकेदारों के
जिन्हें टेण्डर भरते जाना है, और साहूकारों के
जिनके निवेश की लगातार बढ़त 'शेयर बाज़ार' में निश्चित है ।
इनके अलावा भी करोड़ों हैं जिन्हें हम
अज्ञानी समझते हैं क्योंकि वे कहानियाँ लिखकर
प्रतिष्ठाएँ भुनाते हैं, अख़बारों के दफ़्तर में क़लम चलाकर
पैसा कमाते हैं या केवल काँग्रेस को वोट देते हैं या
जनसंघ को और अपने परिवार के लिए
रोटी-कपड़ा जोड़ लेते हैं ।
हमारा-तुम्हारा वक़्त कोई दूसरा वक़्त
नहीं होगा और मैं अकर्मण्य हूँ कि
हमारा वक़्त कोई दूसरा वक़्त क्यों नहीं, और इस तरह
एक दूसरा वक़्त जीतने के लिए मैं लड़ाई का
सरंजाम करता हूँ, सेनापतियों को
खोजता हूँ, उनके झण्डे देखता हूँ, सही रंग की पताका के
पीछे लगी पंक्ति में कहीं अन्त में
खड़ा हो जाता हूँ ।
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Sunday, October 12, 2014
क्रान्ति की प्रतीक्षा-7 / कमलेश
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