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Sunday, December 28, 2014

कबित्त (कवित्त) / इब्ने इंशा

(एक)

जले तो जलाओ गोरी,पीत का अलाव गोरी
अभी न बुझाओ गोरी, अभी से बुझाओ ना ।
पीत में बिजोग भी है, कामना का सोग भी है
पीत बुरा रोग भी है, लगे तो लगाओ ना ।।
गेसुओं की नागिनों से, बैरिनों अभागिनों से
जोगिनों बिरागिनों से, खेलती ही जाओ ना ।
आशिकों का हाल पूछो, करो तो ख़याल- पूछो
एक-दो सवाल पूछो, बात जो बढ़ाओ ना ।।

(दो)

रात को उदास देखें, चांद को निरास देखें
तुम्हें न जो पास देखें, आओ पास आओ ना ।
रूप-रंग मान दे दें, जी का ये मकान दे दें
कहो तुम्हें जान दे दें, मांग लो लजाओ ना ।।
और भी हज़ार होंगे, जो कि दावेदार होंगे
आप पे निसार होंगे, कभी आज़माओ ना ।
शे'र में 'नज़ीर' ठहरे, जोग में 'कबीर' ठहरे
कोई ये फ़क़ीर ठहरे, और जी लगाओ ना ।।

इब्ने इंशा

Sunday, October 12, 2014

झूलत कदम तरे मदन गोपाल लाल / गंगादास

झूलत कदम तरे मदन गोपाल लाल,
बाल हैं बिशाल झुकि झोंकनि झुलावती।१।

कोई सखी गावती बजावती रिझावती,
घुमड़ि घुमड़ि घटा घेरि घेरि आवती।२।

परत फुहार सुकुमार के बदन पर,
बसन सुरंग रंग अंग छबि छावती।३।

कहैं गंगादास रितु सावन स्वहावन है,
पावन पुनित लखि रीझि कै मनावती।४।

गंगादास

Sunday, March 9, 2014

चंद्रिका चकोर देखै निसि दिन करै लेखै / आलम

चंद्रिका चकोर देखै निसि दिन करै लेखै ,
चंद बिन दिन दिन लागत अंधियारी है ।
आलम सुकवि कहै भले फल हेत गहे ,
कांटे सी कटीली बेलि ऎसी प्रीति प्यारी है ।
कारो कान्ह कहत गंवार ऎसी लागत है ,
मेरे वाकी श्यामताई अति ही उजारी है ।
मन की अटक तहां रूप को बिचार कैसो,
रीझिबे को पैड़ो अरु बूझ कछु न्यारी है ।

आलम का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

आलम

Tuesday, January 14, 2014

फूट गये हीरा की बिकानी कनी हाट हाट / गँग

फूट गये हीरा की बिकानी कनी हाट हाट,

काहू घाट मोल काहू बाढ़ मोल को लयो।

टूट गई लँका फूट मिल्या जो विभीषन है,

रावन समेत बस आसमान को गयो।

कहै कवि गँग दुरजोधन से छत्रधारी,

तनक मे फूँके तें गुमान बाको नै गयो।

फूटे ते नरद उठि जात बाजी चौसर की,

आपुस के फूटे कहु कौन को भलो भयो।



गँग का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

गँग