चन्दन की दो डालियाँ
जब टकराईं
तो पैदा हुई अग्नि
और लगी फैलने
चहुँओर
ख़ुशबू तो
एक ही थी
दोनों की
सो उसने चाहा
कि रोके इस आग को
पर ख़ुद को
खोकर रही
उधर आग थी
कि खाक होकर रही
अब
न चंदन है
ना ख़ुशबू है
चतुर्दिक
उड़ती हुई राख है
और तीन दिल चाक हैं...
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Tuesday, October 14, 2014
और तीन दिल चाक हैं / अरुणा राय
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