उसका अपना ही करिश्मा है फ़सूँ है, यूँ है
यूँ तो कहने को सभी कहते है, यूँ है, यूँ है
जैसे कोई दर-ए-दिल हो पर सिताज़ा कब से
एक साया न दरू है न बरू है, यूँ है,
तुमने देखी ही नहीं दश्त-ए-वफा की तस्वीर
चले हर खार पे कि कतरा-ए-खूँ है, यूँ है
अब तुम आए हो मेरी जान तमाशा करने
अब तो दरिया में तलातुम न सकूँ है, यूँ है
नासेहा तुझको खबर क्या कि मुहब्बत क्या है
रोज़ आ जाता है समझाता है, यूँ है, यूँ है
शाइरी ताज़ा ज़मानो की है मामर 'फ़राज़'
ये भी एक सिलसिला कुन्फ़े क्यूँ है, यूँ है, यूँ है
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Thursday, November 28, 2013
उसका अपना ही करिश्मा है फ़सूँ है यूँ है / फ़राज़
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