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Sunday, November 9, 2014

उफ़ुक़ उफ़़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं / अख़्तर होश्यारपुरी

उफ़ुक़ उफ़़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं
दिए जलें न जलें दाग़ जलते रहते हैं

मिरी गली के मकीं ये मिरे रफ़ीक़-ए-सफ़र
ये लोग वो हैं जो चेहरे बदलते रहते हैं

ज़माने को तो हमेशा सफ़र में रहना है
जो क़ाफ़िले न चले रस्ते चलते रहते हैं

हज़ार संग-ए-गिराँ हो हज़ार जब्र-ए-ज़माँ
मगर हयात के चश्मे उबलते रहे हैं

ये और बात कि हम में ही सब्र ओ ज़ब्त नहीं
ये और बात कि लम्हात टलते रहते हैं

ये वक़्त-ए-शाम है या रब दिल ओ नज़र की हो ख़ैर
कि इस समय में तो साए भी ढलते रहते हैं

कभी वो दिन थे ज़माने से आश्नाई थी
और आईने से अब अख़्तर बहलते रहते हैं

अख़्तर होश्यारपुरी