आँख वा थी
होंट चुप थे
एक रिदा-ए-यख़ हवा ने ओढ़ ली थी
जबीं ख़ामोश
सज्दे बे-ज़बाँ थे
आगे इक काला समंदर
पीछे सुब्ह-ए-आतिशीं थी
और जब लम्हें रवाँ थे
हम कहाँ थे
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Thursday, March 27, 2014
आँख वा थी / ख़ालिद कर्रार
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