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Sunday, December 14, 2014

भारत भुइं तुम्है बोलाय रही / उमेश चौहान

भारत भुइं तुम्है बोलाय रही, ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ
झाखरु कटिगा मुलु ठूंठु ऐसि, अब ना ख्यातन मां खड़े रहौ

सोने कै चिड़िया माटी भै, कुछु मति हमारि अस काटी गै,
सत मंजिला कै बसि नींव सुनौ खाली बरुआ ते पाटी गै,

ढहि गईं मंजिलै अलग न तुम निचली मंजिल मां पड़े रहौ
भारत भुइं तुम्है बोलाय रही, ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ

भुइं मोरि चंदरमा ऐसि रहै, मुलु राहु-केतु सब गांसि लिहिन,
परदेसी चतुर चिरैयन का चुपके लासा मां फांसि लिहिन,

अब इधर बढ़ौ या उधर बढ़ौ, ना चौराहे पर खड़े रहौ
भारत भुइं तुम्है बोलाय रही, ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ

तुम्हरे असि जूनन के द्वारा जो मानवता का बोझु बंधा,
वहु छूटि बिथरि गा मुला तबौ जूना अस ऐंठबु तुम्हैं सधा,

चिलवलि की तितुली जैसे तुम ना हवै हवा मां उड़े रहौ
भारत भुइं तुम्है बोलाय रही, ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ

मंगता कुबेर के लरिका भे, हथिनी के पैदा मूसु भवा,
उइ कांटा पांयन सालि रहे जिनके बेरवा हम खुदै बोवा,

बिनु मढ़े ढोलकिया ना बाजै सो बार-बार तुम मढ़े रहौ
भारत भुइं तुम्है बोलाय रही, ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ

तुम पांच रहौ अब अनगिनतिन, च्यातौ अब तत्व बिचारि लेव,
अपनत्व छूटि गा दुनिया ते, अब आपन स्वत्व संभारि लेव,

तुम गदहा, घोड़ा के संकर, खच्चर पर अब ना चढ़े रहौ
भारत भुइं तुम्है बोलाय रही, ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ

तुम का कुपंथ कै अमरबेलि हरियर बेरवा असि झुरै दिहिसि,
मेहनति तुम्हारि सब फुरि होइगै, बिसु भरा घाव कोउ दुखै दिहिसि,

अब सजग होउ ना माटी के माधौ बनिकै तुम परे रहौ
भारत भुइं तुम्है बोलाय रही, ना रुकौ ठिठुकि अब बढ़े रहौ

उमेश चौहान

Sunday, December 7, 2014

काहे बुझी सोच कै बाती / उमेश चौहान

काहे चेहरा है मुरझावा,
काहे बुझी सोच कै बाती?

काहे सूखैं ताल-तलैया?
काहे सूखै नदवा नाला?
काहे सूखैं आम-निबहरी?
काहे सूखै भुइंया झाड़ा?
काहे सूखै बुढ़वा बरगदु?
काहे तुम धरती का चूसेउ
मोटे-मोटे पाइप डारि कै?
काहे यहिका हिया सुखायो?
अब काहे तुम पीटौ छाती?

काहे चेहरा है मुरझावा,
काहे बुझी सोच कै बाती?

काहे गायब भईं गौरैया?
काहे गायब हरहा-गोरू?
काहे गीध-चील भे गायब?
काहे गायब जल ते मछरी?
काहे गायब भईं बटेरैं?
काहे रोवैं मोर-पपीहा?
काहे सिसकैं कोयल-मैना?
काहे जहरु भरेउ कन-कन माँ,
फारेउ धरती कै बरसाती?

काहे चेहरा है मुरझावा,
काहे बुझी सोच कै बाती?

काहे जोति लेहेउ गलियारा?
काहे माली बागु उजारा?
काहे इरखा माँ डूबे सब
काहे म्याड़ैं खायं ख्यात का?
काहे ग्वाबरु-कंडा गायब?
काहे पांसि नहीं झौआ भरि?
काहे अन्नु रसायन बोरे?
काहे होरी के रंग फीके?
नहीं देवारी हमैं सोहाती?

काहे चेहरा है मुरझावा,
काहे बुझी सोच कै बाती?

उमेश चौहान

Wednesday, April 16, 2014

म्वार देसवा हवै आजाद / उमेश चौहान

म्वार देसवा हवै आजाद,
हमार कोउ का करिहै।

कालेज ते चार-पाँच डिग्री बटोरिबै,
लड़िबै चुनाव, याक कुरसी पकरिबै,
कुरसी पकरि जन-सेवक कहइबै,
पेट्रोल-पंपन के परमिट बटइबै,

खाली गुल्लक करब आबाद
हमार कोउ का करिहै।

गाँधी रटबु रोजु आँधी मचइबै,
किरिया करबु गाल झूठै बजइबै,
दंगा मचइबै, फसाद रचइबै,
वोटन की बेरिया लासा लगइबै,

फिरि बनि जइबै छाती का दादु,
हमार कोउ का करिहै॥

संसद मां बैठि रोजु हल्ला मचइबै,
देसी विदेसी मां भासनु सुनइबै,
घर मां कोऊ स्मगलिंग करिहै,
कोऊ डकैतन ते रिश्ता संवरिहै,

धारि खद्दर बनब नाबाद,
हमार कोउ का करिहै॥

बहुरी समाजवाद जब हम बोलइबै,
आँखिन मां धूरि झोंकि दारिद छिपइबै,
भारत उठी जब-जब हम उठइबै,
भारत गिरी जब-जब हम गिरइबै,

कोऊ अभिरी करब मुरदाद,
हमार कोउ का करिहै॥

उमेश चौहान

Saturday, February 8, 2014

अरे पुरुषजन! (आल्हा) / उमेश चौहान

अल्प ज्ञान है, करौं अल्पता, कहौं अल्प स्त्री-दुखु गाय।
जो है जननी, जो है भरनी, कस वह छली नित्य ही जाय॥
नारि ताड़ना कै अधिकारी, तुलसी कहा यथारथु गाय।
आँचरु दूधु आँखि माँ पानी, कहा मैथिलीशरण बुझाय।।
मरद-जाति कै मरी चेतना, अबला कथा कही ना जाय।
किंतु जागरत होइ कुछु नारी, निज विमर्श अबु रहीं सुनाय॥
यहि विमर्श का पुरुष न बूझइ, सूझइ कहूँ न सम व्यवहार।
अहं भावना मन पर हावी, देवै सबै तर्क दुतकार॥
कहैं देवता बसैं हुँआ, जहँ, नारी का नित्य होय सम्मान।
किंतु आचरनु एकदम उलटा, पल-पल करैं नारि अपमान॥

प्रेम-विटप विश्वास-बीज ते अँकुरै, बढ़ै, खूबु हरियाय।
फूलै-फरै, तुष्टि उपजावै, नई सृष्टि का करै उपाय॥
पर जब कटै विवेक-मूल तौ डार-पात सब जायँ सुखाय।
अविश्वास कै अमरबेलि चढ़ि चूसै प्रेम-द्रव्य इठलाय॥
जैसे आँखिन माड़ा छावइ, वैसइ दृष्टि-नाश होइ जाय।
नारि-दुर्दशा का निमित्त बनि, पुरुष रहा केतनौ दुखु पाय॥
बिटिया घर माँ होय न पैदा, यहिके केतनेउ करै उपाय।
तरह-तरह कै औषधि-गोली, झाड़-फूँक माँ रकम लुटाय॥
द्याखै नित चाइनीज कलंडर, करै मिलन तरकीब भिड़ाय।
परखनली माँ वीर्य फेंटिकै, नर-शुक्राणु रहा बिलगाय॥
लिंग-परीक्षण करै भ्रूण का, गर्भपात का करै उपाय।
जनम ते पहिले मारै बिटिया, यहि ते अधम कहाँ कछु भाय॥

यहि साजिश ते बचिकै कौनिउ कन्या जनमु लेय घर आय।
छाती पीटै सासु बहुरिया का दस बातैं रोजु सुनाय॥
जैसे-जैसे बड़ी होय वह, घर माँ चिंता जाय समाय।
तरुणी होतै बनै जेलु घर, बाहर जस डकैत मँडराय॥
खेतु-पात, स्कूल, मोहल्ला, ताना फब्ती परै सुनाय।
राक्षस पुरुष चहूँ दिसि घूमैं, गाथा सुनि करेजु फटि जाय॥
साथ पढ़ैया, ज्ञानु सिखैया, द्याह रखैया सबै लबार।
कहाँ सुरक्षित है हियाँ नारी, भारी सजा भोग-दरबार॥
कोर्ट-कचेहरी, थाना-शासन, सब ढिग चुवै पुरुष कै लार।
अस्पताल माँ, चलति कार माँ, इज्जति लुटै भरे बाजार॥

व्याह-योग्य होवै तौ रोवइ, बिनु दहेज कहँ मिलइ भतार।
कर्जु-कुर्जु लै जब सब निपटै, ताना तबौ सुन नित चारि॥
आपन मातु-पिता, घरु छूटै, पति घर बसइ मोहु सब त्यागि।
तबौ सहइ कहुँ थप्पड़ु-गारी, जरइ कहूँ लालच कै आगि॥
प्रसव-वेदना सहै दुसह वह, पालइ पूत नौकरी छाड़ि।
भेदु-भाव सदियन ते झ्यालइ, मन कै व्यथा मनै माँ गाड़ि॥
खून के आँसू रोवइ नारी, काटइ ककस बहेलिया का जाल।
कैसे उड़इ संगठित होइकै, अपनि अस्मिता करइ बहाल॥

स्वेच्छाचारी, स्वारथु भारी, हारी पुरुष-चेतना आज।
मानैं नारी है बेचारी, तबौ न लागइ कौनिउ लाज॥
जैसे खुशबू व्यर्थ हवा बिन, बिन खु्शबू न फूलु मन भाय।
वैसइ नाता नर-नारी का, टूटै तौ अनर्थ होइ जाय॥
'जिय बिनु देह', 'पुरुष बिनु नारी', तुलसी कहा उलट कुछु गाय।
बिनु कन्या कहँ कोमलताई, नारी बिनु कहँ पुरुष सोहाय॥

अरे पुरुषजन! उठौ आजु, अब करौ न कौनौ सोचु-विचार।
समय आइगा परिवर्तन का, संसकार सब लेउ सुधारि॥
नई चेतना जगै देश माँ सबका मिलइ न्याय-अधिकार।
नई डगरिया, नई बयरिया, बहै नई समता कै धार॥
मुक्त होउ संकीर्ण सोच ते, तजौ घृणित व्यभिचार-विचार।
मनुज जाति का अमिरितु नारी, जेहिते होय सृष्टि-संचार॥
नर-नारी वहि रथ के पहिया, जेहि पर चढ़िकै चलै समाजु।
एकै गति ते दूनउ चलिहैं, तबहीं पूर्ण होइ सब काजु॥
आँखीं ख्वालौ, अब ना ड्वालौ, ब्वालौ एक कंठ ते आजु।
नर बिनु नारि, नारि बिनु नर कहँ, अग जग करैं दोउ मिलि राजु॥

उमेश चौहान

Sunday, January 19, 2014

जउनी गली जाऊँ / उमेश चौहान

जउनी गली जाऊँ, आगि बरसै मुलुक मां।

गंगा की धार, रावी, सतलुज की धार मां,
ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी कछार मां,
इरखा बढ़ी है, खूनु बरसै मुलुक मां॥

मनई का भारी होइगै, मनई कै देहिया,
लोग भे बनैले, बनु होइगै सारी दुनिया,
जुलुम की आंच द्याहैं झरसैं मुलुक मां॥

अल्ला, राम बिहंसैं रकतु बरसाए ते,
वाहे गुरू खुश होएं अरथी चढ़ाए ते,
दानवी क्रिया ते देव हरसैं मुलुक मां॥

पेमु गा बिलाय, सुखु गुलरी का फूलु भा,
धरमु, करमु सबु गुलरी का फूलु भा,
घर के घरौआ बिसु परसैं मुलुक मां॥

उमेश चौहान

Tuesday, October 29, 2013

शहर कै सुबह बनाम गांव का भोरु / उमेश चौहान

शहर कै सुबह बड़ी संगीन,
गांव का भोरु बड़ा रंगीन।

सुरुज आँखी फैलाए ठाढ़,
लखै मनइन कै अदभुद बाढ़,
गली-कूंचा हैं येतने तंग,
हुवां रवि कै है पहुँच अपंग,
सबेरहे हार्न उठे चिल्लाय,
मील का धुवां सरग मंडराय,
जिन्दगी भाग-दौड़ मां लीन,

शहर कै सुबह बड़ी संगीन॥

सुरुज कै लाली परी देखाय,
बिरछ सब झूमि उठे इठलाय,
कोयलिया रागु सुनावै लागि,
बयरिया तपनि बुझावै लागि,
नदी-तट चहकैं पक्षी-वृन्द,
फिरैं सब लोग बड़े स्वच्छंद,
जिन्दगी प्रेम-सुधा मां लीन,

गांव का भोरु बड़ा रंगीन॥

सभ्यता उड़ै पंख फैलाय,
कृत्रिमता अंग-अंग दरसाय,
जहाँ पानी तक म्वाल बिकाय,
प्रदूषित वातावरण देखाय,
जहाँ छल-छंदु मचावै रंग,
प्रकृति ते होय नित हुड़दंग,
फिरै सारा समाजु गमगीन,

शहर कै सुबह बड़ी संगीन॥

किसनवा हर ते धरती फारि,
लाग अमिरुत कै करै फुहार,
हरेरी चूनरि धरती धारि,
किहिसि सब गांवन का सिंगारु,
सुंगन्धै भरिन जंगली लता,
हृदय हुलसायिसि कंचन-प्रभा,
प्रकृति निज सुंदरता मां लीन,

गांव का भोरु बड़ा रंगीन॥

उमेश चौहान

Wednesday, October 23, 2013

जमीन हमरी लै लेउ / उमेश चौहान

लै लेउ!
अब जमीन हमरी लै लेउ!

खेतु लेउ!
खलिहानु लेउ!
ऊसरु लेउ!
उपजाऊ लेउ!
जौनि चाहौ तौनि लेउ!
पुरिखन कै थाती लेउ!
बुझे दिया कै बाती लेउ!
प्रानन ते पियारी लेउ!
अँसुवन कै कियारी लेउ!
लै लेउ! सरकार अब लै ही लेउ!

कर्जु सहा जाति नहीं,
बीजु बोवा जाति नहीं,
आत्महत्याकारी भूमि लै ही लेउ!
जौनु भाव चाहौ हमैं तौनु देउ!
कौनौ औरु जियै का सहारा देउ!
सूखि गईं ईंटन मां गारा देउ!

दवा देउ!
दारू देउ!
गाड़ी याक मारू देउ!
इज्जत देउ,
पहिचान देउ!
नौकरी देउ!
अरमान देउ!
माटी कै मड़ैया अब
लरिकनौ का ना चाही,
सूखि गए बेरवन मां
कहाँ कौनिउ छाँह बाकी,
हमैं तो अब उड़ै का अकासु चाही,
हमैं तो अब बूड़ै का पतालु चाही,
चुल्लू भरि पानी मां अब डूबि मरै का मनु नाही!

सेज़ के नाम पै लै लेउ!
पॉवर प्लान्ट के नाम पै लै लेउ!
मल्टीनेशनल कै खातिर लै लेउ!
एक्सप्रेस हाइवे कै खातिर लै लेउ!
लैंड बैंक के खाता मां लै लेउ!
जौने नाम ते चाहौ लै लेउ!

लै लेउ! यह धरती लेउ!
फसलन कै अरथी लेउ!
सगरी ठकुरसुहाती लेउ!
फारि कै हमरी छाती लेउ!
काँधेन ते हरु खींचि-खींचि,
पसीना ते ख्यात सींचि-सींचि,
बीति गवै उमिरि सारी,
मिटी ना कबहूँ उधारी,
अब तो है हिम्मत हारी,
लै लेउ यह जमीन सारी,
हम ते अब किसानी कै पहिचान सारी लै लेउ!

उमेश चौहान