जब देखो तब हाथ में ख़ंजर रहता है,
उसके मन में कोइ तो डर रहता है.
चलती रहती है हरदम एक आंधी सी,
एक ही मौसम मेरे भीतर रहता है.
दीवारों में ढूँढ़ रहे हो क्या घर को,
ईंट की दीवारो में क्या घर रहता है.
गुज़र रहे हैं बेचैनी से आईने
चैन से लेकिन हर एक पत्थर रहता है.
तंग आ गया हूँ मैं उस की बातो से,
कौन है ये जो मेरे भीतर रहता है.
गौर से देखा हर अक्षर को तब जाना,
प्रश्नों में ही तो हर उत्तर रहता है.
थोडा झुक कर रहना भी तो सीख कभी,
चौबीसों घंटे क्यो तन कर रहता है.
Sunday, October 19, 2014
जब देखो तब हाथ में ख़ंजर रहता है, / अशोक रावत
Friday, October 10, 2014
क्यों छोटी छोटी बातों पर चौपल बिठाई जाती है, / अशोक रावत
क्यों छोटी छोटी बातों पर चौपल बिठाई जाती है,
क्यों हमसे अपने घर में ही हर बात छुपाई जाती है.
कुछ लोग हमारी बस्ती पर पेट्रोल छिड़क कर बैठे हैं,
बस इतना बाक़ी है देखो, कब आग लगाई जाती है.
वो अपनी मर्ज़ी पर मेरा हर बार अँगूठा लेते हैं,
हर बार तबाही से पहले ये रस्म निभाई जाती है.
ये कर देंगे वो कर देंगे, कहते तो जाने क्या- क्या है.
मैं उससे बाहर होता हूँ जब नीति बनाई जाती है.
क्या जाने कौन बहारों को चालाकी से ले उड़्ता है,
क़ीमत तो मेरे खाते से हर बार चुकाई जाती है.
क्या जायज़ है नाजायज़ क्या और किसको इसकी चिंता है,
अब पैसे लेकर संसद में आवाज़ उठाई जाती है.
इस भारत की उस भारत से कोई भी बात नहीं मिलती,
जिस भारत की कम्प्यूटर पर तस्वीर दिखाई जाती है.
Friday, March 28, 2014
ये तो है कि घर को हम बचा नहीं सके, / अशोक रावत
ये तो है कि घर को हम बचा नहीं सके,
चक्रवात पर हमें झुका नहीं सके.
ये भी है की मंज़िलें कभी नहीं मिलीं,
रास्ते मगर हमें थका नहीं सके.
हम किसी की ओट में नहीं थे पर हमें,
आँधियों के सिलसिले बुझा नहीं सके.
देखिए गुलाब की तरफ भी एक बार,
फूल क्या जो ख़ार से निभा नहीं सके.
अंधकार के हज़ार संगठन कभी,
रौशनी के वंश को मिटा नहीं सके.
Tuesday, January 14, 2014
शिकायत ये कि मैं उसकी इबादत क्यों नहीं करता, / अशोक रावत
शिकायत ये कि मैं उसकी इबादत क्यों नहीं करता,
वो सबका है तो फिर मुझ पर इनायत क्यों नहीं करता.
मैं अपने दोस्तों से आजकल मिलता बहुत कम हूँ,
बुरा लगता है तो कोइ शिकयत क्यों नहीं करता.
न जाने ढूँढ़ता रहता है क्या अक्सर किताबों में,
मेरा दस साल का बेटा शरारत क्यों नहीं करता.
तुझे अपनी खुशी के रास्ते ख़ुद ही बनाने हैं,
अगर तू खुश नहीं है तो बग़ाबत क्यों नहीं करता.
उसूलों की बिना पर ही ये दुनिया खूबसूरत है,
ज़माना फिर उसूलों की हिमायत क्यों नहीं करता.
Monday, December 2, 2013
हाँ अकेला हूँ मगर इतना नहीं, / अशोक रावत
हाँ अकेला हूँ मगर इतना नहीं,
तूने शायद गौर से देखा नहीं.
तेरा मन बदला है कैसे मान लूँ,
तूने पत्थर हाथ का फैंका नहीं.
छू न पायें आदमी के हौसले,
आसमाँ इतना कहीं ऊँचा नहीं.
नाव तो तूफ़ान में मेरी भी थी,
पर मेरी हिम्मत कि में डूबा नहीं.
जानता था पत्थरों की ख़्वाहिशें,
पत्थरों को इस लिये पूजा नही.
मैं ज़माने से अलग होता गया,
मैंने अपने आपको बेचा नहीं.

