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Sunday, October 12, 2014

जिन के ज़ेर-ए-नगीं सितारे हैं / आसिफ़ 'रज़ा'

जिन के ज़ेर-ए-नगीं सितारे हैं
कुछ सुना तुम ने वो हमारे हैं

उन के आँखों के वो किनारे दो
बे-करानी के इस्तिआरे हैं

आँसुओं को फ़ुज़ूल मत समझो
ये बड़े क़ीमती सहारे हैं

जो चमकते थे बाम-ए-गर्दूं पर
ख़ाक में आज वो सितारे हैं

गर्मी-ए-शौक़ ने तेरी 'आसिफ़'
उन के रुख़्सार ओ लब निखारे हैं

आसिफ़ 'रज़ा'

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