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Sunday, October 12, 2014

इत्तेफ़ाक़ / अख़्तर-उल-ईमान

दयार-ए-ग़ैर में कोई जहाँ न अपना हो
शदीद कर्ब[1] की घड़ियाँ गुज़ार चुकने पर
कुछ इत्तेफ़ाक़ हो ऐसा कि एक शाम कहीं
किसी एक ऐसी जगह से हो यूँ ही मेरा गुज़र
जहाँ हुजूम-ए-गुरेज़ाँ[2] में तुम नज़र आ जाओ
और एक-एक को हैरत से देखता रहे


उर्दू से लिप्यंतर : लीना नियाज

अख़्तर-उल-ईमान

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