इस बुलंदी पे कहाँ थे पहले
अब जो बादल हैं धुआँ थे पहले.
नक़्श मिटते हैं तो आता है ख़याल
रेत पर हम भी कहाँ थे पहले.
अब हर इक शख़्स है एजाज़ तलब
शहर में चंद मकाँ थे पहले.
आज शहरों में हैं जितने ख़तरे
जंगलों में भी कहाँ थे पहले.
लोग यूँ कहते हैं अपने क़िस्से
जैसे वो शाह-जहाँ थे पहले.
टूट कर हम भी मिला करते थे
बे-वफ़ा तुम भी कहाँ थे पहले.
Tuesday, October 14, 2014
इस बुलंदी पे कहाँ थे पहले / 'अज़हर' इनायती
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