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Friday, October 10, 2014

रंग है री / अजन्ता देव

कैसी आंधी चली होगी रात भर
कि उड़ रही है रेत ही रेत अब तक

असंख्य पदचिन्हों की अल्पना आंगन में
धूम्रवर्णी व्यंजन सजे हैं चौकियों पर
पूरा उपवन श्वेत हो गया है
निस्तेज सूर्य के सामने उड़ रहे हैं कपोत

युवतियाँ घूम रही हैं
खोले हुए धवल-केश
वातावरण में फैली है
वैधव्य की पवित्रता
कोलाहल केवल बाहर है
आज रंग है री माँ! रंग है री।

अजन्ता देव

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