किस बला का जोश जानां तेरे दीवाने में है I
कल ज़मानत पर छुटा था आज फिर थाने में है' II
हर तरह का ज़ुल्म सहकर लोग उफ़ करते नहीं
वो समझता है मज़ा घुट-घुट के मर जाने में है I
और क्या रक्खा है चलकर उसको शर्मिंदा करें
मानते हैं सब कि जादू उसके शर्माने में है I
खार गो क़ायम रहा खिल तो नहीं पाया कभी
ज़िंदगी एक फूल की खिलकर बिखर जाने में है I
उस फ़रिश्ते से मिलोगे जिसका शैतां नाम है
कल तलक वो खुल्द में था आजकल थाने में है I
ख़ैरियत क्या पूछते हो ख़ैरियत है ही कहां
सच तो ये है खैरियत अब सिर्फ मर जाने में है I
ख़ौफ़ से ज़ाहिद के मस्जिद में नहीं जाते थे सोज़
अब ये सुनते हैं कि वो कम्बख्त मयखाने में है II
Friday, October 10, 2014
किस बला का जोश जानां तेरे दीवाने में है / कांतिमोहन 'सोज़'
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