फ़िराक़-ए-यार[1]ने बेचैन मुझको रात भर रक्खा
कभी तकिया[2]इधर रक्खा, कभी तकिया उधर रक्खा
बराबर[3]आईने के भी न समझे क़द्र[4]वो दिल की
इसे ज़ेरे-क़दम[5]रक्खा उसे पेशे-नज़र[6]रक्खा
तुम्हारे संगे-दर[7]का एक टुकड़ा भी जो हाथ आया
अज़ीज़[8]ऐसा किया मर कर उसे छाती पे धर रक्खा
जिनाँ में साथ अपने क्यों न ले जाऊँ मैं नासेह[9]को
सुलूक[10]ऐसा ही मेरे साथ है हज़रत[11]ने कर रक्खा
बड़ा एहसाँ है मेरे सर पे उसकी लग़ज़िश-ए-पा[12]का
कि उसने बेतहाशा हाथ मेरे दोश[13]पर रक्खा
तेरे हर नक़्श-ए-पा[14]को रहगुज़र[15] में सजदा कर बैठे
जहाँ तूने क़दम रक्खा वहाँ हमने भी सर रक्खा
अमीर अच्छा शगून-ए-मय किया साक़ी की फ़ुरक़त[16]में
जो बरसा अब्र-ए-रहमत[17]जा-ए-मय[18]शीशे[19]में भर रक्खा
Monday, October 13, 2014
फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझको रात भर रक्खा / अमीर मीनाई
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