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Friday, October 10, 2014

अलाव / अज्ञेय

माघ : कोहरे में अंगार की सुलगन

अलाव के ताव के घेरे के पार
सियार की आँखों में जलन
सन्नाटे में जब-तब चिनगी की चटकन
सब मुझे याद है : मैं थकता हूँ
पर चुकती नहीं मेरे भीतर की भटकन !

नयी दिल्ली, दिसम्बर, 1980

अज्ञेय

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