रुचि पाय झवाय दई मेँहदी तेहिको रँग होत मनौ नगु है ।
अब ऎसे मे स्याम बोलावैँ भटू कहु जाँउ क्योँ पँकु भयो मगु है ।
अधरात अँधेरी न सूझै गली भनि जोय सी दूतिन को सँगु है ।
अब जांउ तो जात धुयो रँगु री रँगु राखौँ तो जात सबै रँगु है ।
रीतिकाल के किन्हीं अज्ञात कवि का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।
Saturday, October 18, 2014
रुचि पाय झवाय दई मेँहदी तेहिको रँग होत मनौ नगु है / अज्ञात कवि (रीतिकाल)
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