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Monday, October 13, 2014

नन्दा देवी-9 / अज्ञेय

कितनी जल्दी

तुम उझकीं
झिझकीं
ओट हो गईं, नन्दा !
उतने ही में बीन ले गईं
धूप-कुन्दन की
अन्तिम कनिका
देवदारु के तनों के बीच
फिर तन गई
धुन्ध की झीनी यवनिका।

बिनसर, नवम्बर, 1972

अज्ञेय

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