(1)
ऐ सितमगर[1] मेरे इस हौसले की दाद दें,
सामने तेरे अगर फरियाद[2] कर लेता हूँ मैं।
(2)
नहीं है राज कोई राज दीदावर[3] के लिये,
नकाब पर्दा नहीं शौक की नजर के लिये।
(3)
बला[4] है कहर है आफत है फित्ना है कयामत है,
हसीनों की जवानी को, जवानी कौन कहता है?
(4)
मिल गया आखिर निशाने-मंजिले-मकसूद मगर,
अब यह रोना है कि शौके-जुस्तजू[5] जाता रहा।
(5)
यह किसने कह दिया गुमराह कर देता है मैखाना[6] ,
खुदा की फजल[7] से इसके लिए मंदिर हैं, मस्जिद हैं।
Saturday, October 11, 2014
कुछ शेर-4 / अर्श मलसियानी
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