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Friday, March 14, 2014

तुझ पर भी न हो गुमान मेरा / फ़राज़

तुझ पर भी न हो गुमान मेरा
इतना भी कहा न मान मेरा

मैं दुखते हुये दिलों का ईशा
और जिस्म लहुलुहान मेरा

कुछ रौशनी शहर को मिली तो
जलता है जले मकान मेरा

ये जात ये कायनात क्या है
तू जान मेरी जहान मेरा

जो कुछ भी हुआ यही बहुत है
तुझको भी रहा है ध्यान मेरा

अहमद फ़राज़

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