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Tuesday, March 11, 2014

तेरे बदन की ख़ुशबू आई / अज़ीज़ आज़ाद

तेरे बदन की ख़ुशबू आई
हवा चमन की फिर गर्माई

पत्ता-पत्ता नाच रहा है
बूढ़े शजर की शामत आई

भँवरों ने कलियों को चूमा
सारी फ़ज़ा में मस्ती छाई

प्यार का जब पैमाना छलका
दिल की प्यास लबों पे आई

रूप का आँचल सरक रहा है
मस्त हवा ने ली अँगडाई

चाँद नदी में डूब रहा है
काँप रही है अब परछाई

अज़ीज़ आज़ाद

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