इस नाज़ इस अँदाज से तुम हाए चलो हो
रोज़ एक ग़ज़ल हम से कहलवाए चलो हो
रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव
चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो
दीवाना-ए-गुल कैदी-ए-ज़ंजीर हैं और तुम
क्या ठाट से गुलशन की हवा खाए चलो हो
मय में कोई ख़ामी है न सागर में कोई खोट
पीना नहीं आए है तो छलकाए चलो हो
हम कुछ नहीं कहते हैं कोई कुछ नहीं कहता
तुम क्या हो तुम्हीं सब से कहलवाए चलो हो
जुल्फों की तो फितरत ही है लेकिन मेरे प्यारे
जुल्फों से ज़ियादा तुम्हीं बल खाए चलो हो
वो शोख़ सितम-गर तो सितम ढाए चले हैं
तुम हो के ‘कलीम’ अपनी गज़ल गाए चलो हो
Friday, March 14, 2014
इस नाज़ इस अँदाज से तुम हाए चलो हो / कलीम आजिज़
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