इसी अजनबी शहर में कभी
दुरदुराया गया चौतरफा
टौआता रहा कुत्ते-सा दुम दबाये
प्रदूषित हवाओं में से छाना
फेफड़ा भर ऑंक्सीजन
कृत्रिम लाइटों से निकाल ली
ऑंख-भर रोशनी
यहीं देखा छक्के का सातवां पहल
यहीं पाया आठवां रंग
यहीं बिताया जुम्मे-जुम्मे के बीच नौंवी रात
यहीं चखा दसवां रस
यहीं बढ़ा ग्यारहवी दिशा की ओर..
यहीं पर सीखी संकेताक्षरों जैसी भाषा
भाषा के भीतर की भाषा
भाषा के आजू-बाजू की भाषाएं
नाले जैसे बजबजाते इसी शहर में
ढ़ूढ़ लिया लात धरने-भर की जगह
आंतनुमा घुमावदार गलियों में
साबूत रह गया किसी जोंक सा चिपका
शुक्रिया शहर
अब दौड़ूंगा तुम्हारी जलेबीनुमा देह में
चासनी की तरह मिठास बनकर।
Saturday, March 8, 2014
शुक्रिया शहर / कुमार विजय गुप्त
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