घबरा गए हैं वक़्त की तंहाइयों से हम
उकता चुके हैं अपनी ही परछाइयों से हम
साया मेरे वजूद की हद से गुज़र गया
अब अजनबी हैं आप शानासाइयों से हम
ये सोच कर ही खुद से मुख़ातिब रहे सदा
क्या गुफ़्तुगू करेंगे तमाशाइयों से हम
अब देंगे क्या किसी को ये झोंके बहार के
माँगेंगे दिल के ज़ख़्म भी पुरवाइयों से हम
'ज़र्रीं' क्या बहारों को मुड़ मुड़ के देखिए
मानूस थे ख़िज़ाँ की दिल-आसाइयों से हम
Thursday, February 6, 2014
घबरा गए हैं वक़्त की तंहाइयों से हम / इफ़्फ़त ज़रीन
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